उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन आज एक बड़ा और विकराल समस्या का रूप धारण कर चुका है। इस समस्या से निपटने के लिए यदि तुरंत कोई उपाय नहीं किए गए तो हिमालयीय लोक संस्कृति पर भी बहुत बड़ा खतरा मंडरा सकता है। उत्तराखंड में कोई भी सरकार और राजनैतिक दल इससे निपटने के लिए ठोस उपाय नहीं कर पायी है।
अब यह पलायन का मुद्दा महज एक राजनैतिक मुद्दा नहीं रह गया है बल्कि सामाजिक जन जागरण, मानवाधिकार के मूल्यों की रक्षा और अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने के संकट से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों से चाहे स्थानीय पहाड़वासी हों या दूरदराज इलाकों में रहने वाले प्रवासी जन पलायन के अभिशाप की पीड़ा झेलने के लिए विवश हैं। अब सवाल यह उठता है कि उत्तराखंड में पलायन कैसे रुके? इसके कारणों, मूल समस्याओं और निदान–समाधान को लेकर आजकल सोशल मीडिया में एक जोरदार बहस छिड़ी हुई है।
सवाल यह भी उठाए जा रहे हैं कि इस भारी संख्या में हो रहे पलायन के लिए कौन जिम्मेदार है?
ग्रामीण विकास और पलायन आयोग की सात सदस्यीय टीम ने 7950 ग्राम पंचायतों का सर्वे करने के बाद ये पाया कि प्रदेश के 6 पहाड़ी जिलों के 30 विकास खंडों में सबसे ज्यादा पलायन हुआ और प्रदेश में पलायन से खाली हुए भुतहा गांव की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। Read More

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