हम शोक प्रकट करते हैं, कैंडल मार्च निकालते हैं और विरोध करते हैं। फिर राजनीति की आड़ में आवाज़ को दबाने वाले नेताओं की जय-जयकार करते हैं।
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ स्लोगन बहुअर्थी होगा शायद किसी को अंदाजा भी नहीं होगा। हम इस स्लोगन का अर्थ यही समझते आए कि बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए हम कन्या भ्रूण हत्या को रोकने और बेटियों को शिक्षित कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का संदेश दे रहे हैं। लेकिन किसे पता था कि बेटी बचाओ का मतलब सिर्फ गर्भ में हीं पल रही बेटियों को बचाने से नहीं बल्कि इस समाज में जी रही उन तमाम असुरक्षित बेटियों को बचाने से है। जिन पर दरिंदों की गंदी नज़रे रोजाना सिर्फ बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ करने का मौका ढूंढती है।
तेलंगाना में डॉ. प्रियंका के साथ गैंगरेप और फिर जिंदा जलाकर दर्दनाक मौत देने वाले आरोपियों को हमारे देश के कानून पर पूरा भरोसा था कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। तभी इतनी हैवानियत को अंजाम देने का साहस जुटा लिया और देखा जाए तो सच भी है। क्योंकि सात साल पहले निर्भया कांड के आरोपी सज़ा के नाम पर कानूनी दांव-पेंच पर लटकी कार्रवाई का लुत्फ उठा रहे है और यही वो दरिंदे है जो समाज में दूषित मानसिकता को जन्म दे रहे है। साथ ही इसका जीता-जागता उदाहरण बन रहे है कि हम भारत के निवासी हैं, कानून का हमें खौफ नहीं। निर्भया की चीखें हर दूसरी लड़की के मुंह से सुनाई देती हैं और फिर देश को झकझोर देने वाली घटना हम सभी अखबारों और न्यूज़ चैनल में देखते हैं। read more
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