नागरिकता संशोधन बिल को लेकर बीते दिनों भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों में इसके खिलाफ कड़ा प्रदर्शन देखने को मिल रहा हैं।
नागरिकता संशोधन बिल लोकसभा में पास हो चुका हैं। इस बिल के पक्ष में 311 वोट पड़े, जबकि 80 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। नागरिकता संशोधन बिल को लेकर बीते दिनों भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों में इसके खिलाफ कड़ा प्रदर्शन देखने को मिल रहा हैं। तो चलिए सबसे पहले हम आपको बताते हैं कि नागरिकता संशोधन बिल हैं क्या ? नागरिकता संशोधन बिल के तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई के लिए भारतीय नागरिकता हासिल करने के दरवाजे खुल जाएंगे। इस बिल के तहत पहले लोगों को 11 साल रहने की जरुरत थी लेकिन इसी अब घटाकर 6 साल कर दिया गया हैं।

तो इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है कि अब पूर्वोत्तर के लोगों को अब यह डर सत्ता रहा है कि नागरिकता बिल के पास होने से जिन लोगों को नागरिकता मिलती है उसको लेकर असम के लोगों को उनकी पहचान, भाषा और संस्कृति खतरे में पड़ने का ड़र है। इसी के चलते पूर्वोत्तर के राज्यों में इस बिल के खिलाफ कड़ा विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहा हैं।

तो चलिए अब बात करते हैं कि क्या यह बिल सच में सविधान की घाराओं का उल्लघंन करता हैं ? नागरिकता संशोधन बिल को जब जनवरी 2019 मे लोकसभा मे पेश किया गया तो सदन में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी का कहना था कि यह बिल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5, 10, 14 और 15 की मूल भावना का उल्लंघन करता है। साथ ही इस बिल के सबसे बड़ी विरोध की वजह हैं कि यह भारत की नागरिकता को धर्म के आईने से देख रहा है। संविधान के मुताबिक अनुच्छेद 14 हमें समानता का अधिकार देता है।
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